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सूर्यपुत्र कर्ण — अमर गाथा 2 by Vinay

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सूर्यपुत्र कर्ण — अमर गाथा 2 by Vinay - Indian Classical (Veer Ras),Male (Baritone) Vocals music cover art

सूर्यपुत्र कर्ण — अमर गाथा 2

Indian Classical (Veer Ras),Male (Baritone) Vocals

0:003:30
Lyrics
Description
सूर्य की ज्वाला से जन्मा,
अपमान की राख में पला,
जिसे त्यागा गया शैशव में,
वही रणभूमि का दीप जला।
माता का मौन, समाज का दंश,
भाग्य ने हर पथ रोका,
फिर भी आत्मसम्मान की शपथ ने
मेरे मस्तक को कभी न झुकाया।
[स्थायी – कोरस]
मैं कर्ण हूँ—दान का प्रतिरूप,
धर्म का अडिग प्रहरी,
राज न मिला, मान न मिला,
फिर भी रहा स्वाभिमानी, प्रहरी।
भाग्य विरोधी, लोक प्रतिकूल,
सत्य फिर भी न छोड़ा,
रण में गिरा पर धर्म न हारा—
यही सूर्यपुत्र का जोड़ा।
[अंतरा 1]
जाति के नाम पर बाँटा गया,
योग्यता को न तौला गया,
रथ का चक्र धँसा कीचड़ में,
पर साहस न कभी डोला गया।
गुरु के शाप, समय का प्रहार,
सबको धैर्य से सहता गया,
अस्त्रों से पहले आत्मबल को
मैं प्रतिदिन सहेजता गया।
धनुष नहीं था केवल शस्त्र,
वह मेरी साधना थी,
तीर नहीं थे केवल प्रहार,
वे मेरी भावना थी।
[स्थायी – कोरस]
मैं कर्ण हूँ—दान का प्रतिरूप,
धर्म का अडिग प्रहरी,
राज न मिला, मान न मिला,
फिर भी रहा स्वाभिमानी, प्रहरी।
[अंतरा 2]
कवच-कुण्डल जब माँगे गए,
क्षण भर भी न विचलित हुआ,
दे दिया प्राणरक्षक कवच,
तब भी मुख मेरा न मलिन हुआ।
जानता था परिणाम भयावह,
मृत्यु समीप खड़ी थी,
पर दानवीर की प्रतिज्ञा
मेरे रक्त में जड़ी थी।
कृष्ण भी मेरी शक्ति से
पूर्णतः अनभिज्ञ न थे,
अतः धर्म नहीं, नीति के नाम पर
वे भी मौन साक्षी बने।
[मध्यांतर – गंभीर]
माता मिली अंत समय में,
सत्य तब उद्घाटित हुआ,
पर युद्ध से पूर