खिड़की के पास कप ठंडा पड़ा, उसका नाम स्लिपपे पर लिखा नहीं
फोन की स्क्रीन पे 2:17 — दो नीले टिक, और कोई जवाब नहीं
स्वेटर की आस्तीन में अभी भी किसी और की खुशबू उठती है
कैफे की मेज़ पे वो गीला दाग, उँगली पे नहीं रिंग का निशान दिखता है
मैंने उसकी प्लेलिस्ट खोली — वो गाना, वही हँसी, वही झूठ सा लगता
रास्तों पर पुराने नक्शे बिखरे, हर मोड़ पर तेरी परछाई घटती
किसी ने कहा, "वो बस व्यस्त है" — आवाज़ में सवाल थामे हुए
मेरे कमरे की दीवारें पूछतीं, क्यों तूने रास्ता बदला, क्यों खामोश हुए
मैंने जेब में टिकी टिकट निकाली — नाम पर सिर्फ एक और नाम लिखा था
बातों में हल्कापन तो था, पर सच ने जला दिया सब कुछ फिसला सा
तू चुपके से विकाश के पास चली गई (तू चली गई)
मेरा दिल चुरा लिया, रास्ता खाली रह गया (रास्ता खाली)
तू चुपके से विकाश के पास चली गई (तुम चली गई)
अंकित का घर सुनसान, पर सुबह अब भी आएगी
तू चुपके से विकाश के पास चली गई (तू चली गई)
मेरा दिल चुरा लिया, रास्ता खाली रह गया (रास्ता खाली)
तू चुपके से विकाश के पास चली गई (तुम चली गई)
अंकित का घर सुनसान, पर सुबह अब भी आएगी
वो shared playlist, अब किसी और की भाषा में बजती है
हमारी कॉमेडी की लाइनें उसके चैट स्टेटस में खो जातीं
दोस्तों ने देखा पर कुछ कहा नहीं — निगाहें भी कुछ छुपा लेतीं
टिकट से उतरा नाम, "विकाश" — सबूत की तरह जेब में खनकती
मैंने उसका स्वेटर बैक किया — किसी कपड़े ने अब किसी और की शरम भर ली
रातों की तख्तियाँ कहतीं, "आगे चल, पर गाना छोड़ मत देना"
मैंने पुरानी डायरी खोली, पन्नों ने मेरी हाँ में हँसी दे दी
लेकिन हर रेखा पे तेरा नाम कुछ और दिखाता, कुछ और पी लेता
क्यों खामोशी इतनी प्यासी है, और कागज़ इतने बोलते हैं
पलट के देखो — शहर वैसे ही है, पर मेरी खिड़की कम रोशनी देती है
मैंने कहा, "समझाने की कोशिश की" — पर हर समझौता बेनाम रह गया
और सच की ये छोटी-छोटी परतें मेरे अच्छे दिनों को काट गईं
तू चुपके से विकाश के पास चली गई (तू चली गई)
मेरा दिल चुरा लिया, रास्ता खाली रह गया (रास्ता खाली)
तू चुपके से विकाश के पास चली गई (तुम चली गई)
अंकित का घर सुनसान, पर सुबह अब भी आएगी
मैंने स्वेटर की सूई में एक धागा निकाला, और गाने का एक नया कोरस लिखा
खिड़की से सूरज अंदर आया — उसने मेरे पुराने झूठों को मोड़ा
मैंने पुराना सिक्का चपटा कर जमीन पर छोड़ दिया, आवाज़ ने कहा "आगा बढ़"
धूप ने मेरी जुत्ती की सिलाई पर मुस्का दी — और मैं चल पड़ा धीमे-धीमे
संगीत में दर्द पिघला, मैंने अपनी आवाज़ को फिर से सींचा
अब ग़ुस्सा कम है, पर गहरी सी सीख है — मैं अकेला नहीं, मैं सीधा हूँ
तू चुपके से विकाश के पास चली गई (तू चली गई)
मेरा दिल चुरा लिया, पर राहें नई बन रही (राहें बन रही)
तू चुपके से विकाश के पास चली गई (तुम चली गई)
अंकित अब चल रहा है, सुबह उसकी ही है
कप में बासी चाय, फिर भी एक ताजा सुर में गुनगुनाहट है
नोटबुक बंद हुई, पर अगला पन्ना खाली नहीं — नामों से आज़ाद है
तू गई तो गई — शहर में गली वही, पर मेरे कदमों की टंकार नई
अंकित का दिल जो चुराया गया, उसे मैं गीतों में लौटा दूँगा
सुबह आएगी, और मैं खिड़की खोलकर एक नया गीत तर्ज करूँगा — चल पड़ेगा