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शांतनु और गंगा: भीष्म की प्रतिज्ञा 1 by Hxh

SongGPT
शांतनु और गंगा: भीष्म की प्रतिज्ञा 1 by Hxh - Indian,Male vocals music cover art

शांतनु और गंगा: भीष्म की प्रतिज्ञा 1

Indian,Male vocals

0:003:45
Lyrics
Description
(अंतरा 1)
हस्तिनापुर के सिंहासन पर, शांतनु विराजे धीर,
धर्म-सत्य की ज्योति से, जग में फैला था अधीर।
वन के किनारे धनुष लिए, जब दृष्टि पड़ी गंगा पर,
सरस्वती सी निर्मल, अमृतधारा बहा कर।
(कोरस 1)
ओ गंगा, हे प्रिये, वर दो मुझे,
संग चलूँ पथ जीवन का, अमर प्रेम की छाँव में।
प्रतिज्ञा तुझसे निभाऊँ, कर्मों पर न करूँ प्रश्न,
तेरे संग बंधा हूँ मैं, सुख-दुख में रहूँ सदा।
(अंतरा 2)
मधुर मुस्कान में छुपा, शापों का गहना था,
सात पुत्रों की छाया, बहाए जल में वे मुक्त हुआ।
राजा का हृदय टूटा, वचन में बँधा रह गया,
धर्म की मूरत समर्पित, भीष्म का दीप जला गया।
(कोरस 2)
ओ गंगा, हे प्रिये, वर दो मुझे,
तेरे वचन की छाँव में, जीवन बने स्वर्णिम गीत।
धर्म-रहित न कोई प्रश्न, प्रतिज्ञा रहे अमर,
तेरे संग हर पल बंधा, मैं झुकूँ न कभी।
(ब्रिज – संगीत अंतरा)
(सारंगी की मधुर तान, तबले की धीमी थाप के साथ)
हृदय के द्वंद्व में डूबा, शान्तनु की पीड़ा छुपी,
प्रेम और वचन के बीच, झूमती भावना नयी।
(अंतरा 3)
गंगा संग पावन बंधन, छाया स्वर्गिक आनंद,
वियोग की करुणा में, छिपा जीवन का गान।
अष्टम पुत्र भीष्म बने, सत्य का प्रतिबिंब महान,
धर्म, तपस्या और सत्य का, गहना रहा युग-युगान।
(कोरस 3 – अंत में परिवर्तन)
ओ गंगा, हे प्रिये, वर दो मुझे,
तेरे आशीष की छाँव में, जग में गूँजे मेरा नाम।
प्रतिज्ञा की यह धारा, बहती रहे अनवरत,
तेरे संग बँधा हूँ मैं, अमर प्रेम के संग्राम।