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व्यंग्य की आधुनिक नारी 1 by shubham

SongGPT
व्यंग्य की आधुनिक नारी 1 by shubham - folk,both vocals music cover art

व्यंग्य की आधुनिक नारी 1

folk,both vocals

0:003:06
Lyrics
Description
(verse)
सोचा था एक व्यंग्य लिखूंगा,
समाज पे फिर तंज करूंगा।
लिख दूंगा कुछ बातें ऐसी,
पढ़ कर उसको रोज़ हसूं।।
(verse)
पर विषय चुना पढ़ा भारी है,
केंद्र में मॉडर्न नारी हैं।
ये पुरुष प्रधान समाज है,
और प्रताड़ना इन पर जारी है।
(chorus)
ये जो घर त्याग कर आती हैं,
कानून स्वयं संग लाती हैं।
यातना देती होंगी स्वयं भी,
पर पीड़ित ये कहलाती हैं।
(verse)
कहती हैं "हम शोषित हैं"।
हम कू्रता से पोषित हैं।
हर सच्चे झूठे आरोपों में,
ये "निर्दोष" सदा ही घोषित हैं।
(chorus)
ये जो करती रहती शोर हैं,
हम सरल, शांत, भाव बिचारे हैं।
मन में इनके कोई चोर हैं,
क्या सच में, ये कमजोर हैं?
(bridge)
हर ताने, हर कानून का इनके साथ है।
इनके हर आंसू पर पुरुष का हुआ हाथ है।
हमारे शोक विषाद की किसी को फिक्र कहां।
छोड़ो, ये विवादों की बात है।
(verse)
मुझे खेद है, पर प्रश्न बड़ा ये भारी है,
क्या ये पुरुष प्रधान समाज है?
जहां प्रताड़ना उम्र में जारी है।