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वीर पृथ्वीराज 1 by Games

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वीर पृथ्वीराज 1 by Games - Indian Classical music cover art

वीर पृथ्वीराज 1

Indian Classical

0:003:42
Lyrics
Description
आरम्भ था जब चौहान नाम, धरती ने शौर्य पुकारा था,
दिल्ली की धरती काँपी थी, जब एक बालक ने ललकारा था।
ना झुका कभी, ना रुका कभी, वो सिंहासन का शेर था,
पृथ्वी का था पुत्र वो, वो खुद एक काल का फेर था।
हाथ में धनुष, आँखों में ज्वाला,
राज्य नहीं, उसे प्रिय थी गरिमा की माला।
दुश्मन की रूहें काँप उठीं जब वो रण में उतरता,
हर शब्द उसका न्याय था, हर वार जैसे धर्म से लड़ता।
वीर था वो — पृथ्वीराज!
लोहा नहीं, वो ज्वालामुखी था!
बिन देख बाण चलाता,
कायरों की नस्ल मिटा के जाता।
अंधा किया गया, पर साहस न मरा,
शब्दभेदी बना, जब अंधकार घिरा।
जयचंद ने पीठ में खंजर घोंपा,
पर चौहान का हौसला ना झोंका।
घोड़े की टापें गूँज उठीं थीं,
जब मोहम्मद गौरी की साँसे सूखीं थीं।
शब्दभेदी बाण चला था,
इतिहास की शिला हिला था।
आँखें चली गईं पर लक्ष्य बचा नहीं,
कहता है वक़्त — ऐसा दूसरा राजा हुआ ही नहीं।
वीर था वो — पृथ्वीराज!
न्याय का योद्धा, स्वाभिमान की आवाज़!
आज भी जो सीने में दम रखते हैं,
उसकी गाथा सुनके खून में शरम रखते हैं.