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मत्स्य अवतार भजन by Radha

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मत्स्य अवतार भजन by Radha - Bhajan music cover art

मत्स्य अवतार भजन

Bhajan

0:003:44
Lyrics
Description
जगत नया हुआ, प्रभु की लीला हुई अपरम्पार। हे मत्स्य रूप धरन वाले, जय जय विष्णु नारायण।
जगत नया हुआ, प्रभु की लीला हुई अपरम्पार। हे मत्स्य रूप धरन वाले, जय जय विष्णु नारायण।
प्रले में जिन शब्दोंने, सृष्टी की धने बनाई थी वे, तुम्हारी मचली रचनाने उन्हें समंदर से उपर उठाया।
वेदों की जोती बची, सच्चे ग्यान की लाली आई।
हे मत्स्य रूप धरन वाले, जय जय विष्णु नारायण।
जब समोत्र कुढ़ हुआ लहरे चण कर, कर जने लगी तुम्हारे शांत सपर्षिसे माम प्रत्वी, फिर मुस्काई।
धरान नया जीवन पाया, धर्म की धारा बेले, तुम्हारी चाहिए जिन नारायण।
गलेमे समंदर से उपर उठाया, वेदों की जोती बचि, सचे घ्यान की लाली आयी।
हेमद से रूप धरन वाले, जय जय विश्नु नारायण।
जब समोत्र कृद्ध हुआ, लहरे चनकर करजने लगी।
तुमारे शांत सपर्शिसे, मां पृत्वी फिर मुस्काई।
धराने नया जीवन पाया, धर्म की धारा बेह निकली।
हेमद से रूप धरन वाले, जय जय विश्नु नारायण।
जब समोत्र कृद्ध हुआ, लहरे चनकर करजने लगी।
तुमारे शांत सपर्शिसे, मां पृत्वी फिर मुस्काई।
धराने नया जीवन पाया, धर्म की धारा बेह निकली।
हेमद से रूप धरन वाले, जय जय विश्नु नारायण।
तेरी लिला अनंत, करुणा का अटल भंडार।
उद्धार की यही कथा, गाती है हर रिशी उपकार।
भय मिटे हिरदये, खुले आशा का सवेराया।
हेमद से रूप धरन वाले, जय जय विश्नु नारायण।
तेरी लिला अानंत, करुणा का अटल भंडार।
हेमद से रूप धरन वाले, जय जय विश्णु नारायण।
से हनम ओंजो सिह जतारी का सवेरा Voor विकस्वके हर कλα।
तेरी लिला अनंत, करुणा का अटल भंडार।
तेरी लिला अनंत, करुणा का अटल भंडार।
हेमद से रूप धरन वाले, जय जय विश्णु नारायण।
सुन्दर है ये कथा, सुन हर मुणी नरभाव से रोए।
प्रभू की मचली छवी ने सब को शुर्धावान बनाया।
जीवन में जो जुके, वे पाते हैं शुब फल सदा।
हेमद से रूप धरन वाले, जय जय विश्णु नारायण।
आओ हम सब मिल कर, गायें ये भजन उत्सासे।
वचन लें धर्म निभाने का राखेगे जान की मशासे।
सुरिश्टी की रक्षासन मार्ग, यही हमारा प्रण होगा।
हेमद से रूप धरन वाले, जय जय विश्णु नारायण।
मद से नेवेद उठाये, समुत्र शांत हुआ।
तर मिल गई मनुको नाव, रसी से जुड़ा जीवन करुणा का पुल बना।
सत्य लो लोटी उन सब की आवास।
ये वही गढी थी, जब जगत नया हुआ, प्रभु की लिला हुई अपरंपार।
हेमद से रूप धरन वाले, जय जय विश्णु नारायण।
ये वही घटी थी, जब जगत नया हुआ, प्रभु की लिला हुई अपरंपार।