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धरती की पुकार 2 by Urmila

SongGPT
धरती की पुकार 2 by Urmila - Inspirational,both vocals music cover art

धरती की पुकार 2

Inspirational,both vocals

0:002:44
Lyrics
Description
क्या तुमने कभी सुनी है सपनों में
चमकती कुल्हाड़ियों के भय से
पेड़ों की चीख़कार?
पेड़ों की चीख़कार?
कुल्हाड़ियों के वार सहते
किसी पेड़ की हिलती टहनियों में
दिखाई पड़े हैं तुम्हें
बचाव के लिए पुकारते हज़ारों-हज़ार हाथ?
हज़ारों-हज़ार हाथ?
क्या, होती है तुम्हारे भीतर धमस
कटकर गिरता है जब कोई पेड़ धरती पर?
कटकर गिरता है जब कोई पेड़ धरती पर?
सुना है कभी
रात के सन्नाटे में अँधेरे से मुँह ढाँप
किस क़दर रोती हैं नदियाँ?
किस क़दर रोती हैं नदियाँ?
इस घाट अपने कपड़े और मवेशी धोते
सोचा है कभी कि उस घाट
पी रहा होगा कोई प्यासा पानी
या कोई स्त्री चढ़ा रही होगी किसी देवता को अर्घ्य?
किसी देवता को अर्घ्य?
कभी महसूस किया कि किस कदर दहलता है
मौन समाधि लिए बैठे पहाड़ का सीना
विस्फोट से टूटकर जब छिटकता दूर तक, कोई पत्थर?
छिटकता दूर तक, कोई पत्थर?
सुनाई पड़ी है कभी भरी दुपहरिया में
हथौड़ों की चोट से टूटकर बिखरते पत्थरों की चीख़?
बिखरते पत्थरों की चीख़?
खून की उलटियाँ करते
देखा है कभी हवा को, अपने घर के पिछवाड़े?
अपने घर के पिछवाड़े?
थोड़ा-सा वक्त चुराकर बताया है कभी
कभी शिकायत न करने वाली
गुमसुम बूढ़ी पृथ्वी से उसका दुख?
पृथ्वी से उसका दुख?
अगर नहीं; तो क्षमा करना!
मुझे तुम्हारे आदमी होने पर संदेह है!!
मुझे तुम्हारे आदमी होने पर संदेह है!!
🔥 वन महोत्सव के नाम पर, कुछ दिन पेड़ लगाते हो,
‘धरती बचाओ’ कह-कह क