हल्की बारिश की खंक, विनाइल क्रैकल, कॉमल-एकॉस्टिक-गितार की प्लक,
धीरे से पियानो के सस्पिन्डेट कॉर्ट्स घुलते हुए।
खिर्की के कांच पर तेरी तस्वीर धुंदली सी टपट पी करती है।
रात के लैम की रोशनी बस तेरे छेहर का किनारा बनाती है।
कप में बची ठंडी चाय की खुश्बू, तेरे छोड़े हुए उन लवजों की तरह,
जो सुबा के अख़बार के साथ गुम होते हो, दिल मेरी तक्ती पे रुख जाते हैं।
गड़ी की टिक-टिक में तेरी हसी की हलकी गून छिपी रहेती है।
हर सरत हवा की सांस मुझे तेरे बालों की खुश्बू याद दिलाती है।
मैं उठाता हूँ और पुराना स्वेटर, अभी भी तेरी ख्वाहिशों से भीगा है।
और दिल कहता है मैं कह रहा हूँ कुछ पर शब्द कहां तक लिख पाए।
तेरे बाद भी मैं जिन्दा हूँ, तेरी यादों में ही जिन्दा हूँ।
जो तूने छोडा था रास्ता, वही ख़डा हूँ अभी बेवजा,
बरसात की हर बूंद में तेरा नाम फिसलता है मेरे लफ़जों से।
कमरे के कोने में वो किताबे, तेरी हसी की अंगुलियों के निशां बोझलें।
मौनिंग पैलेट की टीन, मैं तेरी लिखी तूटी फूटी लाइने पाती हूँ।
इलेक्ट्रिक गितार का हलका एको जब तेरी हसी को दोहराता है,
तो मुझे लगता है तू दूर है पर कहीं आसपास तेरे कदम चल रहे है।
तेरे चुने हूए रास्तों की खुशबू अभी भी जूतों में पड़ी है।
आलमारी में फसी वो टिकर जिसे तूने मुस्कुरा कर कहा था हम ले चलेंगे।
मैं उन शब्दों को खोलता हूँ जैसे किसी पुराने ख़जाने की तिजोरी।
पर पाता हूँ कि जख्म भी शाँसे मेरे लिए क़वच बन बैठे हैं।
तेरे बाद भी मैं जिन्दा हूँ।
तेरे बिना भी मैं जिन्दा हूँ।
पर नां मेरा अभी तेरा जो तूने छूडा था रास्ता।
वो खाली सी राह नहीं एक पुराणी दास्ता है।
मैं चलता हूँ उस तनहा सड़क पे
तेरी परचाईं से बाते करके।
रातों के कुछ हिसे अब कम ठंड लगते हैं।
मैं शायद सीख रहा हूँ कि हर लम्ह तेरे बिना भी सांस लेता है।
मगर कुछ हिसे तेरे हैं।
मैंने तेरे गम को अपनी जेव में रख लिया है।
हलका सा भार बन गया है।
मैंने तेरे गम को अपनी जेव में रख लिया है।
हलका सा भार बन गया है।
मैं नहीं कहूँगा कि भूल गया हूँ।
पर अब इसकी बेचेनी से भी दोस्ती है।
यह सुनो, मैं तेरी वो आत्तें याद करता हूँ।
तुम्हारा वो चश्मा जो हमिशा किचन की मेज पे छोड़ाते थे।
तुम्हारा वो गाना, जिसे तुम बिन गाती रहती थी।
और मैं चुपके से सुनता।
और कभी-कभी रात में, मैं खिटकी खोल कर कहता हूँ।
मैं खिटकी खोल कर कहता हूँ।
तुम फीक हो, कहीं कोई जवाब नहीं आता।
पर बारिश के तारों में, तुम्हारी हसी चमक्ती मैसूस होती है।
पर बारिश के तारों में, तुम्हारी हसी चमक्ती मैसूस होती है।
तेरे बाद भी मैं जिन्दा हूँ, तेरी आदों में ही जिन्दा हूँ।
तेरे बाद भी मैं जिन्दा हूँ, तेरी आदों में ही जिन्दा हूँ।
वो रास्ता जिसे तुने छोडा था, अब मेरी मनज़िल की परच्छाई है।
मैं उसे काट कर, आगे बढ़ता हूँ, पर पंद तेरे भी पलतता हूँ अकसर।
तेरे बिना भी मैं जिन्दा हूँ, तेरी आदों में ही जिन्दा हूँ।
पर धूब में अब मेरी परच्छाई भी है, तेरे जाने के बाद मैंने सीखा कि दर्त से दोष्टी भी की जा सकती है।
और तुम्हारी तस्वीर से कहीं मेरी सुबं धीरे धीरे मिलती है।
तेरे बाद भी मैं जिन्दा हूँ, तेरे आदों में ही जिन्दा हूँ।
समक्षित परच्छाई भी है, तेरे जाने के बाद मैंने सीखा कि दर्त से दोष्टी भी की जा सकती हूँ।