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जय हो, रण के देव 2 by Adarsh

SongGPT
जय हो, रण के देव 2 by Adarsh - Folk,both vocals music cover art

जय हो, रण के देव 2

Folk,both vocals

0:003:50
Lyrics
Description
जय हो, रण के देव, अमर त्यागी बारबारिक,
तीन बाणों के स्वामी, युद्ध नीति के अद्वितीय ज्ञानी,
माँ भवानी के आशीष से जन्मा अनुपम रत्न,
पांडव वंश की शान, धर्म की अटल दीवार。
बाल्यकाल से ही साधना में लीन,
घोड़े की टापों संग बढ़ता उत्साह,
धनुष उठाते ही दिशाएँ काँपतीं,
तेरे बाण से आकाश की रेखाएँ भी बँध जातीं।
व्रत लिया— “जहाँ होंगे कमजोर, वहीं दूँगा साथ,”
यह वचन ही बना तेरी पहचान का राजपथ,
कुरुक्षेत्र की पुकार ने बुलाया,
धरती के रणभूमि में धर्म का दीप जलाया।
रथ सजाकर, कमान थामकर,
तू चला युद्ध के द्वार,
श्रीकृष्ण से भेंट हुई—
वे साधु वेश में, पर दृष्टि दिव्य और अपार।
उन्होंने पूछा— “वीर, किसे दोगे सहारा?”
तूने कहा— “जहाँ होंगे पीड़ित, वहीं मेरा किनारा।”
कृष्ण जानते थे, यह संकल्प अद्भुत है,
पर इससे युद्ध का पलड़ा पल में बदल जाएगा।
तब लिया उन्होंने धर्म का कठोर निर्णय,
माँगा तेरे जीवन का सबसे बड़ा अर्पण—
तेरा शीश।
और तूने बिना विलंब, बिना भय,
हँसते-हँसते शीश चढ़ा दिया।
तेरी आँखों में ना कोई शिकायत,
ना कोई मोह, ना कोई भय,
बस धर्म की महिमा और संकल्प की ज्योति।
वर माँगा— “मेरा शीश युद्ध देखे,
हर प्रहार, हर बलिदान का साक्षी बने,”
कृष्ण ने आशीर्वाद दिया—
“तेरा नाम अमर होगा, खाटू में तेरा धाम होगा,
श्याम नाम से लोग तुझे पुकारेंगे,
और उनकी हर मनोकामना पूरी होगी。”
युद्ध समाप्त हुआ, धर्म की जीत हुई,
पर ते