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घर की ओर (Ghar Ki Or) 2 by Surraj

SongGPT
घर की ओर (Ghar Ki Or) 2 by Surraj - Indian Classical, Thumri, Bhairavi Raga,Female Voc music cover art

घर की ओर (Ghar Ki Or) 2

Indian Classical, Thumri, Bhairavi Raga,Female Voc

0:003:43
Lyrics
Description
ओ... ओ... ओ…
जा… ना… है… घर… को…
जा… ना… है… घर…
छूट गए वो कंगन मेरे,
छूट गईं गलियाँ...
बीते बरसों में भी ना सूनी,
माँ की वो बलियाँ...
झरोखों से हर रोज़ झाँकूँ,
दुआ सी लगती है...
मैं तो कब की चली गई थी,
पर सांसें अटकी हैं...
कभी... छाँव में, कभी धूप में,
दिल मेरा बस पूछे —
कब लौटेगी मेरी दुनिया...
मुझे घर जाना है,
मैं रूह भटकती आई हूँ...
उस तुलसी चौरे पे बैठूँ,
जहाँ माँ दीप जलाई हूँ...
मुझे घर जाना है,
जहाँ खिड़की खुली रहती थी...
जहाँ कोई पुकार के कहता था,
“बिटिया कहाँ खोई रहती थी?”
सारे मेले, सारे गीत,
अब भी कानों में गूंजते हैं...
पायल की रुनझुन अब भी,
आँगन में गूँजते हैं...
मेरे नाम की राखी अब भी,
भाई हर साल बाँधता है...
शायद उसे यकीन नहीं,
कि मैं कब की जा चुकी हूँ...
मुझे घर जाना है,
बस इक बार गले लगना है...
उस चौखट को छू के कहना है,
"अब रुखसत होने देना है..."
ओ माँ... ओ माँ... ओ माँ...
तेरे द्वार पे मैं अब भी खड़ी हूँ...
सुन ले मेरा नाम एक बार,
मैं चिरनिद्रा को धारण कर लूँ...