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ख़ुदी के मिटने तक 2 by Razzaq

SongGPT
ख़ुदी के मिटने तक 2 by Razzaq - सुफियाना क़व्वाली,Male Vocals music cover art

ख़ुदी के मिटने तक 2

सुफियाना क़व्वाली,Male Vocals

0:003:45
Lyrics
Description
(मुक़द्दमा - धीमी सुरों में)
मैं कुछ नहीं था,
ना नाम था, ना निशान था
मैं इस जहाँ में आया तो
एक अजीब सी कमी मेरे साथ थी
(अंतरा 1)
वो कमी जो नजर न आई
पर हर सांस में महसूस हुई
मैंने सोचा यह दुनिया दे देगी
पर दुनिया ने सिर्फ खालीपन सिखाया
(चरण 2)
कभी दौलत के पीछे भागा
कि शायद सुकून खरीद लूं
कभी शोहरत को ओढ़ लिया
कि शायद पहचान में खुद को पा लूं
(चरण 3)
कभी पदों में ढूंढा मैंने
कि ताकत में गरिमा मिल जाए
कभी रूपों के साए में
कि सुंदरता में सुकून मिल जाए
(मुक़द्दमा दोहराना)
पर जितना पाया, उतना ही खोया
हर हासिल एक नया सवाल बन गया
मेरे अंदर की प्यास वैसी ही रही
और मेरा दिल रेत का प्याला बन गया
(अंतरा 4 - बढ़ती आवाज में, भावुक)
फिर एक दिन तेरी हक़ीकत खुली
ना शब्दों में, ना दावों में
तू मिला तब, जब मैं न रहा
ना अपनी अहं में, ना अपनी चाहतों में
(कोरस)
मैं तब समझा
कि मैं खोया था जब तक “मैं” था
और जब खुद को भूला
तो तू ही तू हर दिशा में था
(अंतरा 5)
अब ना जन्नत की तलब बाकी
ना दुनिया की चाह, दिल में
ना शोहरत की तलब, ना धर्म का ढोंग
बस तेरा इश्क़ है इस दिल में
(अंतरा 6)
ना मेरा स्थान, ना मेरा नाम
ना मैं हूँ, ना मेरी कहानी
अब तू ही मेरी दुनिया है
और तू ही मेरा ठिकाना
(मध्यांतर - धीमी गति से, गहराई के साथ)
हे हक़!
मुझे खुद में समा दे
कि मैं तुझ में पूरा हो जाऊँ
मेरी जो कमी आज़ल से थी
वो तेरे नूर में खो जाए
(कोरस धीमे सुरों में दोहराव)
मैं कु